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Tuesday, September 16, 2008

दिल्ली विस्फोटों का मास्टर माईंड अभी भी पकड़ से बाहर

दिल्ली विस्फोटों के मास्टर माईंड अब्दुस subhan कुरैशी का अभी तक अता-पता नहीं मिला है। यह आदमी इंडियन मुजाहिदीन और ऐसे ही कई अन्य संगठनों के पीछे की प्रमुख शक्ति बताया जाता है। राजनीति में इसके कई पैरोकार हैं जो मुस्लिम वोटों के खातिर इसकी गिरफ्तारी के खिलाफ हैं।

याद रहे उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह ने अपनी सरकार बनते ही सिमी पर से प्रतिबन्ध उठा लिया था और वे आज भी सिमी की वकालत करते हैं। यही मुलायम सोनिया के साथ सौदा करके मनमोहन सिंह की सरकार को बचने के लिए आगे आए थे। गुजरात में हुए विस्फोटों के सन्दर्भ में गिरफ्तार संदिध आतंकियों के परिवारों के साथ सहानुभूति जताने के लिए कांग्रेस के कई दिग्गज भी उनके गाँव जाकर मिले थे। सवाल है कि क्या सरकार ऐसे में सचमुच ही सत्तार जैसे आतंकियों कि गिरफ्तारी कर सकेगी?

वैसे दिखावे के लिए सरकार इंटरपोल को भी सत्तार कि गिरफ्तारी के लिए सूचना जारी कर चुकी है। इंटरपोल देश के बाहर निकल गए अपराधियों को पकड़ने में मदद करती है। सत्तार के बारे में अनुमान है कि वह भारत कि सीमा में ही मौजूद है। तो क्या इंटरपोल को बीच में घसीटना राजनीति की नौटंकी है?

Sunday, September 14, 2008

मैंने केन्द्र को विस्फोट के खतरे के प्रति पहले ही आगाह कर दिया था: मोदी

'मैंने केन्द्र सरकार को दिल्ली में आतंकियों के मंसूबों के बारे में पहले ही बता दिया था'। गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज यह रहस्योदघाटन करते हुए कहा कि आतंकवाद के मुद्दे पर राजनीति करना मेरी तासीर नहीं है। ऐसे मुद्दों पर हमारा एक दूसरे पर आरोप लगाना राष्ट्र हित में नहीं है।

उन्होंने कहा कि दिल्ली में हुए विस्फोटों से उन्हें काफी दुःख और अफ़सोस हुआ है। कुछ नेता कहलानेवाले लोग ऐसे मुद्दों पर भी राजनीती करने अपराधियों और आतंकियों की हौसला आफजाई कर रहे हैं। श्री मोदी ने बताया कि इस मुद्दे पर राष्ट्र को एकजुट होकर काम करने कि जरूरत है।

सनद रहे कि अहमदाबाद और सूरत जैसी जगहों पर विस्फोटों के बाद लालू और रामविलास पासवान और मुलायम सिंह जैसे लोगों ने नरेन्द्र मोदी पर सिमी के विरुद्ध दुर्भावना की नीयत से काम करने का आरोप लगाते हुए सिमी पर से प्रतिबन्ध हटाने की मांग की थी।

भयावह त्रासदी फ़िर याद आई, सरकारों पर भरोसा नहीं

दिल्ली में हुए धमाकों ने जयपुर वासियों के मन में चार महीने पहले की भयावह त्रासदी की यादें ताजा कर दी हैं। लोग एक बार फ़िर चिंतित दीख रहें हैं। रविवार को शहर के बड़ी चौपड़ पर हमने कुल ११७ व्यक्तियों से, जिनमें २५ से ४० वर्ष के लोगों की संख्या अधिक रही, पूछा की क्या वे अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हैं तो तीन चौथाई से अधिक लोगों का जबाब न में था।
यह पूछने पर कि क्या वे राज्य या केन्द्र सरकार पर उनकी पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था का भरोसा करते हैं जबाब एक बार फ़िर न में था। अपवादों को छोड़ किसी को सरकारों पर भरोसा नहीं है।

दिल्ली विस्फोट में मरनेवालों की संख्या ३० से अधिक संभव

दिल्ली विस्फोट में मरने वालों की संख्या १८ के पर चली गई है। हमारे सूत्रोंके मुताबिक यह संख्या ३० से अधिक हो सकती है। याद रहे ५० से अधिक लोग गंभीर अवस्था में दिल्ली के कई अस्पतालों में भरती हैं। सबसे ज्यादा घायल व्यक्ति राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भरती

सरकार ने विस्फोट की जिम्मेदारी लेनेवाले संगठनों के बारे में कुछ भी कहने से इंकार करते हुए इस दिशा में जाँच कराने की बात कही है। हम इस सरकार से इससे अधिक उम्मीद भी क्या करें?

Saturday, September 13, 2008

दिल्ली में विस्फोट: कमजोर सरकार पर एक और चोट

आज दिल्ली में भी देश के कई दूसरे नगरों की तरह लगातार कई बमों के धमाके हुए। सरकार बताती है तीन लोग मारे गए। लोग जानते हैं भारत में झूठों का पुलिंदा बाँटना सरकारों का चरित्र रहा है। लोग तो बहुत अधिक मारे गए होंगे।
आख़िर क्या वजह है कि भारत में ही ऐसे धमाके होते रहते हैं? दुनिया में मुसलमानों को सबसे ज्यादा चिढ अमेरिका से है। लेकिन गौर करें कि वहां हिंदुस्तान कि तरह आए दिन आतंकी वारदातें नहीं होतीं। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को गिराने कि घटना के बाद वहां कोई बड़ी वारदात करने कि हिम्मत आतंकियों की नहीं हुई। आख़िर क्यों?
अमेरिका एक सख्त देश है और वह आतंकियों से किसी भी मुद्दे पर सोदबजी नही करता। इसके उलट भारत का इतिहास कायराना रहा है।
विश्वनाथ प्रताप से लेकर भाजपाई सरकारों ने लगातार आतंकियों से समझौते किए हैं। सोनिया के इशारे पर नाचनेवाली मौजूदा सरकार से किसी भी किस्म के सार्थक कदम उठाने की उम्मीद करना बेमानी है।
आख़िर हमारी जनता कब तक ऐसी सरकारें चुनती रहेगी और ख़ुद का नाश करवाती रहेगी?
इस मुद्दे पर मैं आपके विचार जानना चाहूँगा।